मानसून weather


मानसून - The Weather



 

मूवर्स एंड पैकर्स,  जैसा कि दस्तूर है, सवा दो घंटे की देरी से पहुँचे
 आदमी कम थे, समान ज्यादा आखिर पिछले दस सालो से खरीदी  हुई हज़ारो चीजो को डिब्बे में पैक करना था ! रेनू ने कहा, "कबाड़ इकट्ठा करने की तुम्हारी पुरानी आदत हैं! हर अलमारी, हर डिब्बा खोलकर देख लो ! नए घर में सिर्फ वही जायेगा, जो काम का है! बाकी सब कबाड़ी के काम का है !"
हम बेशक नए घर जा रहे थे, पर बीवी तो पुरानी थी ! आर्डर इज आर्डर ! मै श्रद्वापूर्वक अलमारियों की जाँच में लग गया ! बच्चे दौड़ते हुए आये और बोले, "नए घर में बड़ी से बालकनी भी है !"
बेटे और बेटी की हंसी का ठप्पा लग गया, यानि दुनिया गुलज़ार  हो गई  ! मैंने बच्चो को देखा और सोचा, सबकुछ तो है मेरे पास ! नौकरी में तरक्की हो गई  है, नया घर  लिया है और नई गाड़ी लेने के लिए रोज घर में हाई लेवल पीस नेगोसिएशन चल रही है !
मूवर्स और पैकर्स ने अपना काम चालू कर दिया ! एक ने , कमरे के एक कोने को देखकर कहा, "सर इस अलमारी का क्या करना है ?"
हर छठे महीने हम मिया बीवी के बीच ये एक सवाल अक्सर उठ खड़ा होता है ! वो आज फिर इस कमरे में गूंज रहा था !
"इस अलमारी का क्या करना है "
अगले 6 घंटे मूवर्स एंड पैकर्स महाभारत के सिपाहियो की तरह लड़ाईया लड़ते रहे !
अंकुर के एथलेटिक ट्राफी की टोपी डिब्बे में फिट नहीं आ रही थी ! अंकिता की साईकिल का स्टैंड तीर की तरह पैकिंग से बाहर निकला जा रहा था ! क्रोकरी की पैकिंग नुक्ताचीनी की चैंपियन, मेरी बीवी के मन की नहीं हो रही थी ! मोजो के जोड़ीदार बिछड़ गए थे और मुझे सिगरेट कि तलब हो रही थी और साथ ही साथ शक भी कि मजदूर से मेरा किर्स्टल ऐशट्रे किसी डिब्बे में छिपा के तो नहीं रख दिया !

वही 7 फुट ऊँची, साल की लकड़ी से बनी अलमारी ! मजदूर ने फिर से पुछा। "सर इस अलमारी का क्या करना है ?" सच पूछो तो मै कभी जान ही नहीं पाया था कि इस अलमारी का करना क्या है ? मेरे दादा जी ने अपने स्टूडेंट डेज़  में इसे खरीदा था ! जब पापा स्टूडेंट हुए तो उन्हें मिली और फिर मुझे !
मजदूर ने कहा "सर पूरा नाप लिए है ! ये 7 फुट की अलमारी है ! ना तो ये आपके नए मकान की सीढ़ियों से ऊपर जायेगी और ना आपके दरवाज़े से अंदर घुस पायगी !" रेनू  झुंझलाते हुए अंदर आई और बोली "आज इस अलमारी का फैसला करना ही होगा !"  मैंने दादा जी की विरासत को देखा और एक लम्बी साँस ली !
मजदूरो के कांट्रेक्टर से कहा " बॉस किसी कबाड़ी को जानते हो जो यह अलमारी खरीद सके ?"

 मैंने रेनू से कहा, "कम से कम इसकी चाबी तो दे दो ! आखरी बार देख लू कि इसमे क्या है ?"
अलमारी का दरवाजा, जोर से आवाज करके ऐसे खुला, जैसे वर्षो का कोई राज़ एक मन्त्र फूंकने से खुल गया हो ! अंदर मेरे दादा जी और पिताजी की यादो की महक थी ! पीले पड़ गए पन्नोवाली किताबे थे, पुराने फ़ोटो एल्बम थे,  दादी कि चूड़िया रखने का छोटा सा बॉक्स था ! एक पानदान था जिसमे दादी का सरोता था और उसमे काटी   गई  सुपारी के टुकड़े ! रामचरित्रमानस रखने का स्टैंड था, जिस पर अक्सर पिताजी सुंददरकांड पड़ा करते थे ! माँ के सिन्दूर कि डिब्बी थी जो वो अपनी विदाई के वक़्त अपने घर से लाई थी !जो वर्षो पहले खो गई थी और महीनो हम ढूंढ़ते फिरे थे ! भूरे गत्ते की वो फ़ाइल भी थी जिसमे गांव की प्रॉपर्टी के वो कागज थे जिनको लेकर पिताजी और उनके तीन भाइयो में मनमुटाव हो गया था ! पिताजी ने आखिर कहा था "नहीं चाहिए मुझे ये जमीन ! कागज़ के पन्ने रिश्तो से ज्यादा जरूरी नहीं है मेरे लिए !"
सूती कपडे का एक बण्डल था, जिसमे मेरी चिट्ठिया थी जो मैंने इंजीनियरिंग कॉलज से लिखी थी ! मै जानता  था कि रेनू इंतजार कर रही होगी कि कब मै इस अलमारी का सामान रद्दी में फैंक दू, कब कबाड़ी इस लकड़ी के पिंजरे को ले जाये !  गलती उसकी नहीं थी ! मैंने उसे बताया नहीं था कि जो बीत गया उससे मेरा कोई रिश्ता भी था !
रेनू ने पुछा "कुछ मिला ?" मैंने कहा,"पांच मिनट दो यार ! तीन पुश्तों की यादे बंद है इसमे !"
कमब्खत मजदूर जैसे सर पर सवार थे ! फिर पूछने  आये "सर लंच का टाइम हो रहा है ! इस अलमारी का क्या करना है ?"
कुछ देर बाद ऊब के सब लोग कमरे से चले गए ! मजदूर खाना खाने और रेनू किसी और कमरे में कुछ और काम करने ! मै और अलमारी इस अकेले आमने-सामने खड़े थे, एकदम वैसे ही जैसे 15 साल पहले मै और पिताजी मानसून की एक दोपहर में आमने-सामने गुस्से में तमतमाए खड़े थे !
उस रोज़ उस कमरे में शब्द नहीं थे, बस एक दहकती हुई ख़ामोशी थी ! मै और पिताजी जैसे के प्लेटफार्म पर एक-एक छोर पर, प्लेटफार्म के सामने अगल-बगल चल रही पटरियों कि तरह ! हम इस घर में साथ-साथ तो थे, पर मै जानता था हम कभी मिल नहीं सकते थे ! मेरी जिंदगी क्या हो, मेरा रास्ता कौन सा हो, मै किस से शादी करू, इस विषय में वो और मै कभी एक राय नहीं हो पाये !
मै उस मानसून के दोपहर उन्हें बताने गया था कि ये जिंदगी मेरी है और इसे मै जैसे चाहूं वैसे जिऊंगा !
हाथ में अपॉइंटमेंट लैटर था और आँखों में नया गरूर!  मैंने कहा "मुझे नौकरी मिल गए है पिताजी ! आपकी सिफारिश के बिना "
पिताजी ने अपनी छड़ी फैंक दी थी और उसके दो टुकड़े हो गए थे ! आज उसी याद का दहकता हुआ लम्हा - पिताजी की टूटी हुई छड़ी का हैंडलवाला हिस्सा सामने अलमारी में पड़ा था !
बरस दर बरस बीत गए ! मानसून की उस दोपहर के बाद गुस्से का नक़ाब पहने मै और मेरे पिताजी एक-दूसरे के लिए अजनबी हो गये ! ना मैंने उन्हें कभी फ़ोन किया, ना उन्होंने अपने पसंदीदा काले फाउंटेन पेन से मुझे लैटर लिखा ! माँ से बात होती थी तो ऐसे नाटक करती थी जैसे सब ठीक हो ! अगर पिताजी की आवाजे पीछे से सुनाई भी पड़ गई तो मै उस का ज़िक्र नहीं करता था !



"सर, कबाड़ीवाला आ गया है ," दोनों अलमारी को एकटक देख रहे थे ! उसके कुछ रूपए कैद थे उसमे, और मेरी भूली हुई जिंदगी  ! वो जिंदगी। . वो रिश्ते। .. वो  शहर। वो गली। … वो छज्जा। … वो दहलीज। .... वो खिड़की। … जिससे एक-एक करके मै सारे नाते तोड़ चुका था  ना जाने कब अपनों से अजनबी बन चुका था !
"सर, लकड़ी अच्छी है साल की, पर बहुत पुरानी हो गई है ! दीमक भी लग गया है ! इसके मै हज़ार रूपए तक दे  सकता हूँ "  85 साल पुरानी, चमकीले रिश्तो और कितने खूबसूरत लम्हो में लिपटी अलमारी ! इसका दाम उसने लगाया था, सौ रूपए के दस नोट ! इतनी सस्ती तो नहीं होती यादे -- है ना !
गाड़ी ट्रैफिक लाइट पर खड़ी थी ! गुस्से में रेनू ने फिर एक बार पूछा "आर यू श्योर ? आखिर तुम्हारा ही आईडिया था ये। …" मै कुछ कहता उस से पहले ट्रैफिक लाइट हरी हो गई ! बाकि का रास्ता एक नाराज़ ख़ामोशी में गुजरा !

विजया टावर की 5 मंजिल पर मिस्टर खुराना एक रियल स्टेट एजेंट के साथ बैठे थे ! लड़का चाय लाया ! एजेंट ने कहा "इसे ले जाओ ! ठंडा लाओ ! साहब को जरा ठंडे दिमाग से सोचना है !" मैंने रेनू की तरफ देखा ! वो जान भूझकर किसी मैग्जीन के पन्ने पलट रही थी ! इतने गुस्से में थी कि मेरी तरफ देखना भी नहीं चाहती थी !
मैंने एजेंट से कहा "मैंने सब सोच लिया है बॉस ! मै ये मकान नहीं ले रहा हूँ "
मिस्टर खुराना बोले "देखिए, आपकी मर्जी आपकी है, मुझे कोई ग्राहक मिल जायेगा ! लेकिन आपको बता दू कि इतने पैसे में इस एरिया में, थ्री बेडरूम फ्लैट आपको मिल जाये तो ये मकान फ्री रख लीजियेगा !"
मैंने कहा,"खुराना साहेब, मुझे ये मकान फ्री भी नहीं चाहिए !"  

एजेंट अपना सिर पकड़ कर बोला "सर, अचानक ऐसा क्या हो गया ? दो दिन में आपका ग्रहप्रवेश था "
मैंने कहा, मकान बहुत खूबसूरत है ! बस सात फुट की मेरी एक यादो की एक अलमारी है, जो उसमे जा नहीं पायेगी ! मैंने आज यह जान लिया कि इसके बिना मै अधूरा हूँ !"

स्टेट एजेंट के दफ्तर से निकल कर, मैंने एक फ़ोन किया और कहा, "पिताजी में बोल रहा हूँ ! मै गलत था, आप सही थे … मेरी जिंदगी सिर्फ मेरी नहीं है ! मै होली पर घर आ रहा हूँ ! आपकी पोती चार साल की गई है ! बहुत कोशिश की पर आपकी तरह कहानिया नहीं सुना पाया !"

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